Sunday, October 2, 2011

वीर था लाल बहादुर अपना, गाँधी भी कहाँ डरने वाला था
सत्य-अहिंसा से हथियारों से वो तो संग्राम लड़ने वाला था
सादगी ही थी पहचान उनकी, और मनोबल हीरे सा कठोर
याद कर उन देवातमाओं, को मिल कर बढ़ें प्रगति कि ओर. . .


. . . रणधीर

" !! शात्री जी और बापू को कोटि कोटि प्रणाम !! "

Saturday, October 1, 2011

हमें आज़ाद होने में... वक़्त तो लगेगा...




आये कई... और लूट के चले गए
कुछ आये और यहीं के हो गए
पर एक ने कुछ ऐसा किया कि हमें गुलाम बना गए
खुद तो नगें थे ही हमें भी नगें कर चले गए...
अस्भयों को सभ्य बनाने में वक़्त तो लगेगा...
सेकड़ों वर्षों कि गुलामी के बाद...
हमें आज़ाद होने में... वक़्त तो लगेगा...


आज शासन हमारा है लेकिन हम स्वतंत्र कहाँ ?
स्वशासन के इन दशकों में हुए कई प्रयास हैं
आरक्षण, पंचायत, और सब्सिडी से कुछ पुराने तो...
शिक्षा, रोजगार, और सूचना से अधिकारों से कुछ नवीन
इन योजनाओं को कार्यान्वित करने में वक़्त तो लगेगा
सेकड़ों वर्षों कि गुलामी के बाद...
हमें आज़ाद होने में... वक़्त तो लगेगा...

बातें भ्रष्टाचार कि हों या अधिकारों के दुरूपयोग कि
अपने स्वार्थों कि पूर्ति कि या कर्तव्यों के प्रति सजगता कि
मानते हैं हम कि है जर्जर अभी तक हमारी शिक्षा व्यवस्था
अध्यापन और अनुसन्धान के प्रति हम हैं उदासीन...
अशिक्षा के अन्धकार को दूर करने में वक़्त तो लगेगा

सेकड़ों वर्षों कि गुलामी के बाद...
हमें आज़ाद होने में... वक़्त तो लगेगा...


-- रणधीर

Saturday, July 23, 2011

ll हिन्दुस्तान मुश्किल में है ll




पुकार रहा राष्ट्र हमें, की फिर आज हिन्दुस्तान मुश्किल में है l
लांघ रहें सीमाएं दुश्मन. और कुछ गद्दार देश की  मिट्टी में है ll


जागृत हों भारतपुत्रों, दीमक लग चुकी हमारी संस्कृति में है l 
कई नापाक नज़रें फिर ग़री, हमारी विश्वविजयी तिरंगें पे है ll




करों न विचार रास्तों का अब, बस हम मज़िलों का रुख लें l
गाँधी, सुभाष, आज़ाद, कुवर सिंह से अब तो कोई सिख लें ll

सरफरोशी की तम्मना, जगाना अब हरेक के दिल में है l
दिखा दो दुश्मनों को, बल कितना हमारी बाजुओं में है ll




तुम अहिंसा से लड़ो, या करो अश्त्रों - शास्त्रों से श्रृंगार तुम l
सीना ताने डटे रहना, तुम ही सेनिक और हो सम्मान तुम ll 

जागृत हों भारतपुत्रों !
लांघ रहें सीमाएं दुश्मन. और कुछ गद्दार देश की भूमि में हैं l
राष्ट्र है पुकार रहा, की फिर आज हिन्दुस्तान मुश्किल में है ll




... भारतपुत्र (रणधीर)

Thursday, June 9, 2011

शहीदों के लिए आँसूं न बहाना

उन्होंने कहा था...
शहीदों के लिए आँसूं न बहाना।
याद करना उन्हें...
जब अपनी आज़ादी का गुमाँ हों।

पर आज मैं रोना चाहता हूँ,
शहीदों कि मौत पर...
अपनी बेतुकी आज़ादी पर,
और इस लोकतंत्र पर।

अन्वेषण करना चाहता हूँ कारणों का
राष्ट्रभक्ति की क्षणभंगुरता का...
गद्दारों की बिलाश्ता का
और दुश्मनों के संरक्षण का 

आखिर क्यों ?
कभी कंधे से कन्धा मिला के चलें थे
आज वही अनेकता में एकता का देश
बिखरा हुआ क्यों है ?

कभी सोने की चिड़ियाँ कहलाने वाला राष्ट्र 
अपने धरती पुत्रों के लालन-पालन में
अक्षम क्यों है ?

दुनिया को सभ्यता और संस्कृति का पाठ पढ़ाने वाला
हमारा देश अब विलायती संस्कृति की
गुलाम क्यों है ?

तक्षशिला और नालंदा का इतिहास समटे
हम भारतियों को उस उत्कृष्टता का 
अभाव क्यों है ?


Saturday, June 4, 2011

!!! कोशिश है मेरी अँधेरे में इक सुराख़ करने कि !!!




कोशिश
है मेरी अँधेरे में इक सुराख़ करने कि।
बढ़ती असुरता को जला कर राख करने कि ।।
माना दूर बहुत है मंजिल अपनी, जरूरत है धीरता कि।
मुश्किलों भरे हैं रास्तें अपने, जरूरत है दृढता
कि ।।

आज मानवीय विकृतिओं ने अपना वर्चश्व दिखाया है।
फिर इक बार दुनिया पे राक्षसों का साम्राज्य छाया है ।।
हर तरफ केवल शोषण और अत्याचारों का बोल-बाला है।
मानवता को ख़तम करने, मानव ही राक्षस बन आया है।।
अपने मासूमों के वेदना और संताप से कराह रही है धरती माँ,
अब जरूरत है मात्री सेवा का, पावन कर्तव्य निर्वाहन कि
माना दूर बहुत है मंजिल अपनी, जरूरत है धीरता कि।
मुश्किलों भरे हैं रास्तें अपने, जरूरत है दृढता
कि ।।

कोशिश है मेरी अँधेरे में इक सुराख़ करने कि।
बढ़ती असुरता को जला कर राख करने कि ।।
. . . . . . .
. . . . . . .
. . . . . . . रणधीर चौधरी

Tuesday, May 24, 2011

कोई और बात क्यों करे ?

बांध लो सर पे कफ़न, तू हार कि बात क्यों करे ?
वतन कि हों हलात ऐसे, तू कोई और बात क्यों करे ?

देशप्रेम हो लहू में जिसके, वो वासना कि बात क्यों करे ?
चलना हो जिसकी नियति, वो थकान कि बात क्यों करे ?
दूध का क़र्ज़ हो जिस पर, वो सेवा कि बात क्यों करे ?
नफ़रत हो बुढ़ापे से, तन के दुर्गंधों से, चहरे पे पड़ीं झुरियों से;
तो रहने दे "मोहन", तू रहने ही दे, तू "माँ" कि बात क्यों करे ?
वतन कि हों हलात ऐसे, तू कोई और बात क्यों करे ?
बांध लो सर पे कफ़न, तू हार कि बात क्यों करे ?

क्रांति कि होती हो महशूश जरूरत जिसे, वो खोफ कि बात क्यों करे ?
काट दो गद्दारों के सर उनके धर से, हम क्षमा कि बात क्यों करें ?
वतन परस्त हो जिसका जमीर, वो मजहब कि बात क्यों करे ?
आती हो शर्म, नोकराशाहों के घोटालों पे, भ्रष्टाचार और बईमानी पे;
तो क्यों शोषित हों अब भी, तू ऐसी जिंदगी ज़ीने कि बात क्यों करे ?
वतन कि हों हलात ऐसे, तू कोई और बात क्यों करे ?
बांध लो सर पे कफ़न, तू हार कि बात क्यों करे ?

Wednesday, April 13, 2011

हम हिन्दुस्तानी ऐसे क्यों होतें हैं ?

मैं तो देश की खाता हूँ, देश की पीता हूँ
हाँ भारत है नाम, मैं जिस देश मैं रहता हूँ

मैं नहीं मेरे जैसे ही सब है यहाँ पे
जो देश की खातें हैं, देश की पीतें हैं
गन्दा कर इसे अमेरिका को साफ़ कहतें हैं और
नंगा कर खुद को अपने को आधुनिक कहतें हैं

खुद बेईमानी कर, ईमानदारी की धुहाई देतें हैं
गरीबों का शोषण कर, कानून के अंधेपन का रोना रोतें हैं
चोर-लूटेरों को वोट करतें हैं, और घोटालों पर रोतें हैं
रब जाने हम हिन्दुस्तानी ऐसे क्यों होतें हैं ?

रुपयों के पीछे भागातें, धनवानों को पूजतें हैं और
बड़े मज़े कहतें हैं, सब स्वार्थी ही क्यों होतें हैं ?
अरे प्यार मैं जीतें और प्यार मैं मरने वाले,
हम हिन्दुस्तानी प्यार के दुश्मन क्यों होतें हैं ?



फिर जीद हमें करना होगा !

जोश और जूनूं, का हो संचार
आओ करें हम अपने देश पे विचार
बंद करें ये कदाचार और भ्रष्टाचार
करें स्वतंत्र भारत का स्वप्न साकार

कहाँ है जनता का, जनता के लिए लोकतंत्र
आज कानून गया है अपने अंधेपन से हार
जनता का बखूबी हो रहा है शोषण
और भर रहा है नेताओं का स्व-भंडार

तोड़ने हो अगर बेड़ियाँ अपनी स्व-परतंत्रता की
फिर से कई आन्दोलन हमें करने होंगे
नव उलास भर, नव चेतना को जागृत कर
क्रांति के पथ पे बढ़ाना होगा, फिर जीद हमें करना होगा
फिर जीद हमें करना होगा

Tuesday, February 15, 2011

ये मुस्कुराहटें किसी कि आमनातें हैं ...
हो गम हमें , पर उन्हें ना हो ...
बस येही सोच दर्द में भी मुस्कुरातें हैं !!!

Friday, February 4, 2011

हम भारतीय हैं !

सुखी रोटी-दाल सही, हैं हम कंगाल सही
अपने मन कि करतें हैं अपने मन से जीते हैं
रोज एरी घिस्तें हैं, फिर जम के हडियाँ पीतें हैं
चलो बीती एक और शाम सही, कल कि बातें काल सही

न है बिजली न है पंखा, न खाट का है काम कोई
उप्पर अम्बर नीचे घास, इस ना है आराम कोई

JAGO GAON: Reality of the Rural India

JAGO GAON: Reality of the Rural India

जिद्द हमें करना होगा !

भारत माता कि चरणों में
बलिदान बेटों को होना होगा !
इस आराजकता से मुक्ति हेतु
फिर जिद्द हमें करना होगा !!

बूढी हो चुकी संसद में
जर्जर हो चुकी व्यवस्था में
जोश का रक्त हमें भरना होगा
फिर जिद्द हमें करना होगा !!

नंगी होती सभ्यता को
अंधी होती मानवता को
गंगा-दर्शन करना होगा
फिर जेद्द हमें करना होगा !!

Saturday, January 29, 2011

जिंदगी बहुत लम्बी है और
हमारे पास वक़्त बहुत कम !
जिंदगी के इस सफ़र में ...
अब तक अकेले हैं हम !

रोज दिन गुजरता है ...शाम ढलती है ...फिर
नए ख्वाबों को संजोयें...रात आती है ...

सारी रात ख्वाबों को जीने के बाद

फिर जब नए ताज़गी लिए सुबह आती है...

फिर से वही आत्म-विश्वास और सव्भिमान लिए

राहों पे आगे कि और तेज़ी चल देता हूँ...क्योंकि

जिंदगी बहुत लम्बी है और हमारे पास वक़्त कम !


पर पथ के काँटों से पग छली होने लगतें हैं,

तो किसी कि...

कोमल स्पर्श कि जरूरत महशूस होती है...

मैं जब रास्तों के ठोकरें खा कर गिरता हूँ...

तो एक फिर ...किसी कि...

किसी हाँथ कि कमी महशूस होने लगती है...

जब सूरज तेज़ गर्मी शरिर कि ऊर्जा चूसने लगती है...

तो किसी कि

आँचल कि छाऊँ कि जरूरत मसूस होती है...

जब रह के थपेड़ों से, हिम्मत टूटने लगती है,

तो किसी...

सहारे कि जरूरत महशुस होने लगती है...

जब थक-हर कर थोड़ी देर सुस्ताने को जी चाहता है...

तब किसी के गोद कि जरूरत महसूस होती है...

और जब पथेर पे सर रख कर sone कि कोशिश करता hoon

तो पत्थर कि कठोरता हर पल मुझे...

इस बात का एहसास दिलाती है कि ...

मैं अकेला हूँ...!!!


क्योंकि जिनदगी बहुत बड़ी है और हमारे पास वक़्त कम है...

जिंदगी के सफ़र मैं हर पल, अकेलेपन का एहअसास होता है...

जिंदगी गुजर जाती है कितनी मोहोब्त से...?

जब हमसफ़र का साथ होता है...!