Tuesday, May 24, 2011

कोई और बात क्यों करे ?

बांध लो सर पे कफ़न, तू हार कि बात क्यों करे ?
वतन कि हों हलात ऐसे, तू कोई और बात क्यों करे ?

देशप्रेम हो लहू में जिसके, वो वासना कि बात क्यों करे ?
चलना हो जिसकी नियति, वो थकान कि बात क्यों करे ?
दूध का क़र्ज़ हो जिस पर, वो सेवा कि बात क्यों करे ?
नफ़रत हो बुढ़ापे से, तन के दुर्गंधों से, चहरे पे पड़ीं झुरियों से;
तो रहने दे "मोहन", तू रहने ही दे, तू "माँ" कि बात क्यों करे ?
वतन कि हों हलात ऐसे, तू कोई और बात क्यों करे ?
बांध लो सर पे कफ़न, तू हार कि बात क्यों करे ?

क्रांति कि होती हो महशूश जरूरत जिसे, वो खोफ कि बात क्यों करे ?
काट दो गद्दारों के सर उनके धर से, हम क्षमा कि बात क्यों करें ?
वतन परस्त हो जिसका जमीर, वो मजहब कि बात क्यों करे ?
आती हो शर्म, नोकराशाहों के घोटालों पे, भ्रष्टाचार और बईमानी पे;
तो क्यों शोषित हों अब भी, तू ऐसी जिंदगी ज़ीने कि बात क्यों करे ?
वतन कि हों हलात ऐसे, तू कोई और बात क्यों करे ?
बांध लो सर पे कफ़न, तू हार कि बात क्यों करे ?