गर्मियों में सिर पे रहने वाला,
सर्दियों में कुहासों में छुपकर बैठा है
माना हर ऋतु, वसन्त-हेमन्त होता नहीं
कौन कहता है, सूरज रोता नहीं...
सुना था आए थे कई सुरवीर
सूरज बनने का दावा करते
सबकी रातें स्याह हुईं
तारे बन सब लटक गए
छोड़ो-छोड़ो उन लम्हों को जो बित गईं
सर्दी की नयी सुबह, करें कुछ बात नयी
माना सर्द है मौसम, मुश्किलें हैं बड़ी
होसला तो करो, घर से निकलो तो सही
<<<तस्वीर न सही रंग तो बदलें, तक़दीर न सही मन तो बदलें>>>