Saturday, June 4, 2011

!!! कोशिश है मेरी अँधेरे में इक सुराख़ करने कि !!!




कोशिश
है मेरी अँधेरे में इक सुराख़ करने कि।
बढ़ती असुरता को जला कर राख करने कि ।।
माना दूर बहुत है मंजिल अपनी, जरूरत है धीरता कि।
मुश्किलों भरे हैं रास्तें अपने, जरूरत है दृढता
कि ।।

आज मानवीय विकृतिओं ने अपना वर्चश्व दिखाया है।
फिर इक बार दुनिया पे राक्षसों का साम्राज्य छाया है ।।
हर तरफ केवल शोषण और अत्याचारों का बोल-बाला है।
मानवता को ख़तम करने, मानव ही राक्षस बन आया है।।
अपने मासूमों के वेदना और संताप से कराह रही है धरती माँ,
अब जरूरत है मात्री सेवा का, पावन कर्तव्य निर्वाहन कि
माना दूर बहुत है मंजिल अपनी, जरूरत है धीरता कि।
मुश्किलों भरे हैं रास्तें अपने, जरूरत है दृढता
कि ।।

कोशिश है मेरी अँधेरे में इक सुराख़ करने कि।
बढ़ती असुरता को जला कर राख करने कि ।।
. . . . . . .
. . . . . . .
. . . . . . . रणधीर चौधरी

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