वो जो आ बैठे हैं,
पुआल की ढेरों पे,
कह दो उनसे
चूहों ने खोल दी है
उनकी खोखली जमीन की पोल
तिलचट्टों ने भी, कर लिया है इरादा
फिर से, नदी की तटों पे जाने का
छुछन्दरों ने दोस्ती कर ली है, चमेली से
कुत्तों ने भी कर ली है पहचान
रोटिओं के असली मालिक की
बिल्लिओं ने छोड़ दिया है
चूहों का शिकार करना...
और बांधे घूम रही है घंटियाँ
खरगोशों ने शरू कर दिया है सत्याग्रह
गधों ने शुरू कर दी है जोगिंग...
अब रंगे सियारों की खैर नहीं
रंगरेजों ने काम उल्ट लिया है
और दीमकों ने ढूंढ़ निकला है...
पुआलों पे बैठे मुर्दों को...
<<<रणधीर भारत>>>
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